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https://jagatkasaar.blogspot.com/2026/04/day-64-daily-5-shlok-series.html आज के Day 64 में 5 शक्ति
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥उच्चारण की विधि - श्रेयान्, द्रव्यमयात्, यज्ञात्, ज्ञानयज्ञः, परन्तप, सर्वम्, कर्म, अखिलम्, पार्थ, ज्ञाने, परिसमाप्यते ॥ ३३॥शब्दार्थ - परन्तप पार्थ अर्थात् हे परंतप अर्जुन !, द्रव्यमयात् अर्थात् द्रव्यमय, यज्ञात् अर्थात् यज्ञकी अपेक्षा, ज्ञानयज्ञः अर्थात् ज्ञानयज्ञ, श्रेयान् अर्थात् अत्यन्त श्रेष्ठ है (तथा), अखिलम् अर्थात् यावन्मात्र, सर्वम् अर्थात् सम्पूर्ण, कर्म अर्थात् कर्म, ज्ञाने अर्थात् ज्ञानमें, परिसमाप्यते अर्थात् समाप्त हो जाते हैं।हे परंतप अर्जुन ! द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है, तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञानमें समाप्त हो जाते हैं॥ ३३ ॥4.33देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥उच्चारण की विधि - देहिनः, अस्मिन्, यथा, देहे, कौमारम्, यौवनम्, जरा, तथा, देहान्तरप्राप्तिः, धीरः, तत्र, न, मुह्यति ॥ १३ ॥शब्दार्थ - यथा अर्थात् जैसे, देहिनः अर्थात् जीवात्माकी, अस्मिन् अर्थात् इस, देहे अर्थात् देहमें, कौमारम् अर्थात् बालकपन, यौवनम् अर्थात् जवानी (और), जरा अर्थात् वृद्धावस्था (होती है), तथा अर्थात् वैसे ही, देहान्तरप्राप्तिः अर्थात् अन्य शरीरकी प्राप्ति होती है, तत्र अर्थात् उस विषयमें, धीरः अर्थात् धीर पुरुष, न मुह्यति अर्थात् मोहित नहीं होता।जैसे जीवात्माकी इस देहमें बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीरकी प्राप्ति होती है; उस विषयमें धीर पुरुष मोहित नहीं होता ॥ १३ ॥2.13य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥उच्चारण की विधि - यः, एवम्, वेत्ति, पुरुषम्, प्रकृतिम्, च, गुणैः, सह, सर्वथा, वर्तमानः, अपि, न, सः, भूयः, अभिजायते ॥ २३ ॥शब्दार्थ - एवम् अर्थात् इस प्रकार, पुरुषम् अर्थात् पुरुषको, च अर्थात् और, गुणैः अर्थात् गुणोंके, सह अर्थात् सहित, प्रकृतिम् अर्थात् प्रकृतिको, यः अर्थात् जो मनुष्य, वेत्ति अर्थात् तत्त्वसे जानता है *, सः अर्थात् वह, सर्वथा अर्थात् सब प्रकारसे, वर्तमानः अर्थात् कर्तव्य कर्म करता हुआ, अपि अर्थात् भी, भूयः फिर, न अर्थात् नहीं, अभिजायते अर्थात् जन्मता ।इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य तत्त्वसे जानता है*, वह सब प्रकारसे कर्तव्यकर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता ॥ २३॥13.23ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६ ॥उच्चारण की विधि - ये, तु, सर्वाणि, कर्माणि, मयि, सन्न्यस्य, मत्पराः, अनन्येन, एव, योगेन, माम्, ध्यायन्तः, उपासते ॥ ६॥शब्दार्थ - तु अर्थात् परंतु, ये अर्थात् जो, मत्पराः अर्थात् मेरे परायण रहनेवाले भक्तजन, सर्वाणि अर्थात् सम्पूर्ण, कर्माणि अर्थात् कर्मोंको, मयि अर्थात् मुझमें, सन्न्यस्य अर्थात् अर्पण करके, माम् अर्थात् मुझ सगुणरूप परमेश्वरको, एव अर्थात् ही, अनन्येन अर्थात् अनन्य, योगेन अर्थात् भक्तियोगसे, ध्यायन्तः अर्थात् निरन्तर चिन्तन करते हुए, उपासते अर्थात् भजते हैं * ।परन्तु जो मेरे परायण रहनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वरको ही अनन्य भक्तियोगसे निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं * ॥ ६ ॥12.06अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वाष्र्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥उच्चारण की विधि - अधर्माभिभवात्, कृष्ण, प्रदुष्यन्ति, कुलस्त्रियः, स्त्रीषु, दुष्टासु, वाष्र्णेय, जायते, वर्णसङ्करः ॥ ४१॥शब्दार्थ - कृष्ण अर्थात् हे कृष्ण !, अधर्माभिभवात् अर्थात् पापके अधिक बढ़ जानेसे, कुलस्त्रियः अर्थात् कुलकी स्त्रियाँ, प्रदुष्यन्ति अर्थात् अत्यन्त दूषित हो जाती हैं (और), वाष्र्णेय हे वाष्र्णेय!, स्त्रीषु अर्थात् स्त्रियोंके, दुष्टासु अर्थात् दूषित हो जानेपर, वर्णसङ्करः अर्थात् वर्णसंकर, जायते अर्थात् उत्पन्न होता है।हे कृष्ण! पापके अधिक बढ़ जानेसे कुलकी स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वाष्र्णेय ! स्त्रियोंके दूषित हो जानेपर वर्णसंकर उत्पन्न होता है ॥ ४१ ॥1.41

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