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**“जब अपमान बना मोक्ष का द्वार!
राजमहल छोड़ वन को चले धृतराष्ट्र | विदुर का वज्र-वाणी उपदेश | कल

11 vistas· 15/02/26
Dharm Yug
Dharm Yug
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महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था,
धर्म की विजय हो चुकी थी,
पांडवों का राज्य स्थापित था—
फिर भी… हस्तिनापुर के राजमहल में एक आत्मा तड़प रही थी।
श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रथम स्कंध, त्रयोदश अध्याय में आता है वह क्षण,
जब राजा धृतराष्ट्र—जो जीवन भर मोह, पुत्रासक्ति और सत्ता के अंधेपन में जिये—
अचानक सब कुछ त्यागकर वन की ओर चल पड़ते हैं।
यह कोई साधारण त्याग नहीं था—
यह था अपमान से जन्मा वैराग्य,
और मृत्यु से पहले आत्मा का जागरण।
इस अध्याय में— 🔸 महात्मा विदुर का ऐसा कठोर उपदेश मिलता है, जो आज भी हर मनुष्य को भीतर तक झकझोर देता है
🔸 गांधारी का मौन वैराग्य और कुंती का करुण विलाप हृदय को द्रवित कर देता है
🔸 राजा युधिष्ठिर के मन में पहली बार राजत्याग का विचार जन्म लेता है
🔸 और नारद मुनि कलियुग के उन भयानक लक्षणों को प्रकट करते हैं, जिन्हें आज हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं
यह अध्याय सिखाता है— 👉 त्याग कमजोरी नहीं, सबसे बड़ा साहस है
👉 जो समय रहते नहीं जागता, उसे काल जबरन जगा देता है
👉 भगवान के बिना संसार केवल शून्य रह जाता है
यदि आप जीवन में कभी मोह, अपमान, असुरक्षा या भय से घिरे हों—
तो श्रीमद्भागवत 1.13 आपके लिए आत्मा की अंतिम पुकार बन सकता है।
📿 कथा सुनिए, हृदय से सुनिए—क्योंकि यह अध्याय हमें नहीं, हमारे अहंकार को छोड़ने आया है।
हरि: ॐ 🙏

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