Corti

दीपक००० दीपक०००
2 Visualizzazioni · 25 giorni fa

।। *ओ३म्* ।। 🙏सादर नमस्ते जी।¶• *जैसे हाथ आदि अवयवों के बिना परमेश्वर ने सब जगत् को रचा है वैसे ही वेदों को भी सब साधनों के बिना रचा है क्योंकि ईश्वर सर्वशक्तिमान् है। सृष्टि के प्रारंभ में अग्नि, वायु आदित्य और अंगिरा इन चार ऋषियों के ज्ञान के बीच में अपनी वेदविद्या को प्रेरित करके उनके द्वारा ईश्वर ने वेद प्रकाशित किए।* * *टिप्पणी:-* जैसे मनुष्य मुख आदि साधनों से शब्दों का उच्चारण करते हैं वैसे ही परमेश्वर ने अपने अनंत सामर्थ्य से कार्यशब्दरूपी वेद का उच्चारण करके सृष्टि के प्रारंभ में चार ऋषियों के अंतःकरण में प्रेषित किया। ईश्वर को मनुष्यों के समान मुख प्राणादि साधनों की आवश्यकता उच्चारण के लिए नहीं होती। शब्द दो प्रकार के बताए गए हैं एक नित्य और दूसरे कार्य। नित्य शब्दरूपी वेद ईश्वर के ज्ञान में सदा रहते हैं। कार्य शब्दरूपी वेद प्रलय के समय नहीं रहते। ¶• *ईश्वर में पक्षपात का लेश भी नहीं है। सृष्टि के प्रारंभ में चार पुरुषों को जो वेदों का ज्ञान ईश्वर ने दिया उससे न्यायकारी ईश्वर का साक्षात् न्याय ही प्रकाशित होता है क्योंकि उन्हीं चार पुरुषों का ऐसा पूर्व पुण्य था कि उनके हृदय में उसने वेदों को प्रकाशित किया।* (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदोत्पत्तिविषय)प्रस्तुति:- ध्रुवदेव, दर्शनयोग महाविद्यालय, आर्यवन, रोजड

दीपक००० दीपक०००
3 Visualizzazioni · 26 giorni fa

।। *ओ३म्* ।।
🙏सादर नमस्ते जी।

¶• *जैसे हाथ आदि अवयवों के बिना परमेश्वर ने सब जगत् को रचा है वैसे ही वेदों को भी सब साधनों के बिना रचा है क्योंकि ईश्वर सर्वशक्तिमान् है। सृष्टि के प्रारंभ में अग्नि, वायु आदित्य और अंगिरा इन चार ऋषियों के ज्ञान के बीच में अपनी वेदविद्या को प्रेरित करके उनके द्वारा ईश्वर ने वेद प्रकाशित किए।*

* *टिप्पणी:-* जैसे मनुष्य मुख आदि साधनों से शब्दों का उच्चारण करते हैं वैसे ही परमेश्वर ने अपने अनंत सामर्थ्य से कार्यशब्दरूपी वेद का उच्चारण करके सृष्टि के प्रारंभ में चार ऋषियों के अंतःकरण में प्रेषित किया।

दीपक००० दीपक०००
1 Visualizzazioni · 29 giorni fa

📜 मंत्र एवं भावार्थ
ॐ असतो मा सद्गमय । > तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥
अर्थ: * असतो मा सद्गमय: हे ईश्वर, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो।
तमसो मा ज्योतिर्गमय: मुझे अंधकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले चलो।

दीपक००० दीपक०००
2 Visualizzazioni · 29 giorni fa

*।।ओ३म्।।*

🙏 सादर नमस्ते जी।

*∆∆• स्वयंभूरसि श्रेष्ठो रश्मिर्वर्चोदाऽअसि०॥(यजु० २-२६)*

*भावार्थ:-* *परमेश्वर और विद्वान् जीव का कोई माता-पिता नहीं है किंतु यही (परमेश्वर ही) सब का माता-पिता है तथा जिस से बढ़कर कोई विज्ञानप्रकाशक विद्या देने वाला नहीं है अतः सब मनुष्य को इस परमेश्वर ही की आज्ञा में वर्तमान होना चाहिए॥*

(महर्षिदयानंदकृत यजुर्वेदभाष्य से उद्धृत)

प्रस्तुति:- ध्रुवदेव, दर्शनयोग महाविद्यालय, आर्यवन, रोजड

दीपक००० दीपक०००
2 Visualizzazioni · 29 giorni fa

*।।ओ३म्।।*

🙏 सादर नमस्ते जी।

*∆∆• दिवि विष्णुर्व्यक्रंस्त जागतेन०॥(यजु० २-२५)*

*भावार्थ:-* *जो जो मनुष्य लोग सुगंधि आदि पदार्थ अग्नि में छोड़ते हैं वे अलग-अलग होकर सूर्य के प्रकाश तथा भूमि में फैलकर सब सुखों को सिद्ध करते हैं। मनुष्य को उचित है कि इसी प्रकार बार-बार पुरुषार्थ से दोष, दुःख और शत्रुओं को अच्छी प्रकार निवारण करके सुख भोगना और भुगवाना चाहिए तथा यज्ञ से शुद्ध वायु जल ओषधि और अन्न की* *शुद्धि के द्वारा आरोग्य, बुद्धि और शरीर के बल की वृद्धि से अत्यंत सुख को प्राप्त होकर विद्या के प्रकाश से नित्य प्रतिष्ठा को प्राप्त होना चाहिए॥२५॥*

(महर्षिदयानंदकृत यजुर्वेदभाष्य से उद्धृत)

प्रस्तुति:- ध्रुवदेव, दर्शनयोग महाविद्यालय, आर्यवन, रोजड

दीपक००० दीपक०००
2 Visualizzazioni · 1 mese fa

*।।ओ३म्।।*
🙏 सादर नमस्ते जी।

*_∆∆• अग्ने गृहपते सुगृहपतिस्त्वयाग्नेऽहं०॥(यजु० २-२७)_*
*भावार्थ:-* *संसार रूपी घर का निरंतर रक्षा करने वाला जगदीश्वर और विद्वान है॥२७॥*

*_∆∆• अग्ने व्रतपते व्रतमचारिषं०॥(यजु० २-२८)_*
*भावार्थ:-* *मनुष्य को यही निश्चय करना चाहिए कि मैं अब जैसा कर्म करता हूं वैसा ही परमेश्वर की व्यवस्था से फल भोगता हूं और भोगूंगा। सब प्राणी अपने कर्म से विरुद्ध फल को कभी नहीं प्राप्त होते इससे सुख भोगने के लिए धर्मयुक्त कर्म ही करना चाहिए कि जिससे कभी दुःख नहीं हो॥२८॥*
*(महर्षिदयानंदकृत वेदभाष्य से उदधृत)*
प्रस्तुति:- ध्रुवदेव, दर्शन योग महाविद्यालय, आर्यवन, रोजड़

दीपक००० दीपक०००
3 Visualizzazioni · 1 mese fa

।। *ओ३म्* ।।
🙏🏻सादर नमस्ते जी।

*[सूर्य आदि की उपासना का निषेध]*

*व्यवहार के देवताओं (सूर्य चंद्रमा इंद्रियां आदि) की उपासना कभी नहीं करनी चाहिए, किंतु एक परमेश्वर ही की करनी उचित है।* *इसका निश्चय वेदों में अनेक प्रकार से किया है कि एक अद्वितीय परमेश्वर के ही प्रकाश, धारण, उत्पादन करने से वे सब व्यवहार के देव (सूर्य चंद्र आदि) प्रकाशित हो रहे* *हैं। उनका जन्म कर्म ईश्वर के सामर्थ्य से होता है।--------- और परमेश्वर ने *जिस जिस में जितना जितना दिव्य गुण रखा है उतना उतना ही उन *द्रव्यों में देवपन है, अधिक नहीं। इससे क्या सिद्ध हुआ कि केवल* *परमेश्वर ही उन सब का उत्पादन, धारण और मुक्ति का देने वाला है।*
( *महर्षिदयानंदकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेद विषयविचार)*

*टिप्पणी* :- कोष्ठकांतर्गत शब्द प्रस्तुतकर्ता के हैं।
प्रस्तुतकर्ता:- ध्रुवदेव, दर्शनयोग महाविद्यालय, आर्यवन, रोजड

दीपक००० दीपक०००
5 Visualizzazioni · 1 mese fa

माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी

दीपक००० दीपक०००
3 Visualizzazioni · 2 mesi fa

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शिष्यों को मार्गदर्शन ।

Mostra di più