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📜 मंत्र एवं भावार्थ
ॐ असतो मा सद्गमय । > तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥
अर्थ: * असतो मा सद्गमय: हे ईश्वर, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो।
तमसो मा ज्योतिर्गमय: मुझे अंधकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले चलो।

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।। *ओ३म्* ।।
🙏सादर नमस्ते जी।

¶• *जैसे हाथ आदि अवयवों के बिना परमेश्वर ने सब जगत् को रचा है वैसे ही वेदों को भी सब साधनों के बिना रचा है क्योंकि ईश्वर सर्वशक्तिमान् है। सृष्टि के प्रारंभ में अग्नि, वायु आदित्य और अंगिरा इन चार ऋषियों के ज्ञान के बीच में अपनी वेदविद्या को प्रेरित करके उनके द्वारा ईश्वर ने वेद प्रकाशित किए।*

* *टिप्पणी:-* जैसे मनुष्य मुख आदि साधनों से शब्दों का उच्चारण करते हैं वैसे ही परमेश्वर ने अपने अनंत सामर्थ्य से कार्यशब्दरूपी वेद का उच्चारण करके सृष्टि के प्रारंभ में चार ऋषियों के अंतःकरण में प्रेषित किया।

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।। *ओ३म्* ।। 🙏सादर नमस्ते जी।¶• *जैसे हाथ आदि अवयवों के बिना परमेश्वर ने सब जगत् को रचा है वैसे ही वेदों को भी सब साधनों के बिना रचा है क्योंकि ईश्वर सर्वशक्तिमान् है। सृष्टि के प्रारंभ में अग्नि, वायु आदित्य और अंगिरा इन चार ऋषियों के ज्ञान के बीच में अपनी वेदविद्या को प्रेरित करके उनके द्वारा ईश्वर ने वेद प्रकाशित किए।* * *टिप्पणी:-* जैसे मनुष्य मुख आदि साधनों से शब्दों का उच्चारण करते हैं वैसे ही परमेश्वर ने अपने अनंत सामर्थ्य से कार्यशब्दरूपी वेद का उच्चारण करके सृष्टि के प्रारंभ में चार ऋषियों के अंतःकरण में प्रेषित किया। ईश्वर को मनुष्यों के समान मुख प्राणादि साधनों की आवश्यकता उच्चारण के लिए नहीं होती। शब्द दो प्रकार के बताए गए हैं एक नित्य और दूसरे कार्य। नित्य शब्दरूपी वेद ईश्वर के ज्ञान में सदा रहते हैं। कार्य शब्दरूपी वेद प्रलय के समय नहीं रहते। ¶• *ईश्वर में पक्षपात का लेश भी नहीं है। सृष्टि के प्रारंभ में चार पुरुषों को जो वेदों का ज्ञान ईश्वर ने दिया उससे न्यायकारी ईश्वर का साक्षात् न्याय ही प्रकाशित होता है क्योंकि उन्हीं चार पुरुषों का ऐसा पूर्व पुण्य था कि उनके हृदय में उसने वेदों को प्रकाशित किया।* (ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदोत्पत्तिविषय)प्रस्तुति:- ध्रुवदेव, दर्शनयोग महाविद्यालय, आर्यवन, रोजड

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