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Kratke hlače Stvoriti

नमस्ते !

दीपक००० दीपक०००

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।। *ओ३म्* ।।
🙏🏻सादर नमस्ते जी।

*[सूर्य आदि की उपासना का निषेध]*

*व्यवहार के देवताओं (सूर्य चंद्रमा इंद्रियां आदि) की उपासना कभी नहीं करनी चाहिए, किंतु एक परमेश्वर ही की करनी उचित है।* *इसका निश्चय वेदों में अनेक प्रकार से किया है कि एक अद्वितीय परमेश्वर के ही प्रकाश, धारण, उत्पादन करने से वे सब व्यवहार के देव (सूर्य चंद्र आदि) प्रकाशित हो रहे* *हैं। उनका जन्म कर्म ईश्वर के सामर्थ्य से होता है।--------- और परमेश्वर ने *जिस जिस में जितना जितना दिव्य गुण रखा है उतना उतना ही उन *द्रव्यों में देवपन है, अधिक नहीं। इससे क्या सिद्ध हुआ कि केवल* *परमेश्वर ही उन सब का उत्पादन, धारण और मुक्ति का देने वाला है।*
( *महर्षिदयानंदकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेद विषयविचार)*

*टिप्पणी* :- कोष्ठकांतर्गत शब्द प्रस्तुतकर्ता के हैं।
प्रस्तुतकर्ता:- ध्रुवदेव, दर्शनयोग महाविद्यालय, आर्यवन, रोजड

दीपक००० दीपक०००

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*।।ओ३म्।।*
🙏 सादर नमस्ते जी।

*_∆∆• अग्ने गृहपते सुगृहपतिस्त्वयाग्नेऽहं०॥(यजु० २-२७)_*
*भावार्थ:-* *संसार रूपी घर का निरंतर रक्षा करने वाला जगदीश्वर और विद्वान है॥२७॥*

*_∆∆• अग्ने व्रतपते व्रतमचारिषं०॥(यजु० २-२८)_*
*भावार्थ:-* *मनुष्य को यही निश्चय करना चाहिए कि मैं अब जैसा कर्म करता हूं वैसा ही परमेश्वर की व्यवस्था से फल भोगता हूं और भोगूंगा। सब प्राणी अपने कर्म से विरुद्ध फल को कभी नहीं प्राप्त होते इससे सुख भोगने के लिए धर्मयुक्त कर्म ही करना चाहिए कि जिससे कभी दुःख नहीं हो॥२८॥*
*(महर्षिदयानंदकृत वेदभाष्य से उदधृत)*
प्रस्तुति:- ध्रुवदेव, दर्शन योग महाविद्यालय, आर्यवन, रोजड़

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