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सृष्टि की उत्पत्ति से पहले न आकाश था, न पृथ्वी, न सूर्य और न चंद्रमा। चारों ओर केवल अंधकार और शून्य था। उसी शून्य में एक दिव्य चेतना विद्यमान थी, जिसे हम आदि देव महादेव के नाम से जानते हैं। भगवान शिव न जन्म लेते हैं और न कभी नष्ट होते हैं। वे अनादि, अनंत और अविनाशी हैं।
एक समय ब्रह्मा और विष्णु के बीच यह विवाद हुआ कि सृष्टि का सबसे बड़ा देव कौन है। तभी उनके सामने एक विशाल अग्नि स्तंभ प्रकट हुआ, जिसका न कोई आरंभ दिखता था और न अंत। ब्रह्मा हंस बनकर ऊपर गए और विष्णु वराह बनकर नीचे, परंतु दोनों को उस ज्योति का छोर नहीं मिला।
अंत में उसी अग्नि स्तंभ से भगवान शिव प्रकट हुए और बोले कि जो अहंकार छोड़कर सत्य को अपनाता है, वही मुझे जान सकता है। ब्रह्मा और विष्णु को अपने अहंकार का बोध हुआ और उन्होंने शिव को सृष्टि का मूल स्वीकार किया।
यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार का त्याग और ज्ञान का मार्ग ही शिव की प्राप्ति का साधन है। शिव ही सृष्टि के आधार हैं, इसलिए उन्हें महादेव कहा गया।
