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Title, thumbnail ya video me agar abusing, adult ya sexually explicit content paya gaya to channel bina kisi warning ke permanent delete kar diya jayega. Yeh rule turant lagu hai. Ab tak 350+ channels delete kiye ja chuke hain. Kripya kisi bhi prakar ka adult ya abusive content upload na karein. Rule violate hone par channel bina bataye delete ho jayega.
— Team ApnaTube
Spiritual
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आज के Day 67 में 5 अत्यंत शक्तिशाली श्लोक हैं—इन्द्रिय, मन और बुद्धि पर विजय पाने वाला मोक्षपरायण मुनि, वैरियों की निन्दा और कटु वचन, नियत कर्म का स्पष्ट आदेश, सत्त्वगुण की वृद्धि में शुभ गति, और स्थितप्रज्ञ योगी की रात्रि-जागृति। 5.28 बताता है कि जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जीती हुई हैं तथा जो इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त है, वह सदा मुक्त ही है।
यह episode उन साधकों के लिए है जो चाहते हैं कि उनके कर्म, धैर्य और चेतना—तीनों स्थिर हों। 2.36 में अर्जुन को सिखाया गया कि शत्रुओं की कटु निन्दा से विचलित न हो; 3.8 कहता है कि शास्त्रविहित कर्म करना चाहिए; 14.14 सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु होने पर उत्तम लोकों की प्राप्ति बताता है; और 2.69 स्थितप्रज्ञ की अनोखी दृष्टि समझाता है—जो संसार के लिए रात्रि है, उसमें योगी जागता है।
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Original 5 श्लोक with उच्चारण, शब्दार्थ, भावार्थ
हर श्लोक के बाद छोटा interactive pause
पिछले video पर based quiz with 4 options
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"मेरा श्लोक = 5.28 / 2.36 / 3.8 / 14.14 / 2.69"
"आज मैंने किस जगह मन, इन्द्रिय और बुद्धि पर नियंत्रण का अभ्यास किया?"
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#day67 #bhagavadgita #gitashlok #shrimadbhagavadgita #गीता #भगवद्गीता #स्थितप्रज्ञ #मोक्षपरायण #नियतकर्म #सत्त्वगुण #मुनिकीजागृति #हरहरगीता #हरघरगीता #gitainhindi #dailyshlok #krishna
सप्त चिरजीव म्हणजे सप्त वृत्ती ?
बाइबल में लूट का माल। इस ब्रह्माण्ड का खुदा यहोवा शहर के लोगो का कत्ल करके उनके धन दौलत और स्त्रियां बच्चों को लूटने का आदेश देता है। एक शहर के बाद दूसरे शहर को ऐसे ही बर्बाद करने का आदेश देता है। खुदा और शैतान में इस प्रकार से कोई अंतर नहीं रह जाता है।
@Namu's Rangoli &creativity
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आज के Day 66 में 5 गहरे श्लोक हैं—वाणी का तप जो सत्य, प्रिय और हितकर हो; कल्याणकृत का कभी विनाश नहीं; सूर्य, चन्द्र और अग्नि में स्थित भगवद्-तेज; आत्म-उद्धार का स्पष्ट आदेश; और श्रद्धायुक्त अनसूयु जो गीता-मत का सदा पालन करते हैं। 17.15 के अनुसार जो वाक्य उद्वेग न करनेवाला, प्रिय, हितकारक और यथार्थ हो, साथ ही स्वाध्याय और नाम-जप का अभ्यास हो, वही वाङ्मय तप है।
यह episode उन लोगों के लिए है जो अपने बोलने, सोचने और साधना करने के तरीके को शुद्ध करना चाहते हैं। 6.5 बताता है कि मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, क्योंकि मन ही अपना मित्र भी है और शत्रु भी; 15.12 कहता है कि सूर्य, चन्द्र और अग्नि का तेज भगवान का ही तेज है; और 3.31 बताता है कि श्रद्धा और अनसूया के साथ जो भगवान के मत का पालन करते हैं, वे कर्म-बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।
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आपके दिए हुए 5 श्लोक, original content सहित
हर श्लोक के बाद छोटा interactive pause
पिछली video पर based quiz with 4 options
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"मेरा श्लोक = 17.15 / 6.4 / 15.12 / 6.5 / 3.31"
"आज का अभ्यास = "
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#day66 #bhagavadgita #gitashlok #shrimadbhagavadgita #गीता #भगवद्गीता #वाणीका_तप #आत्मउद्धार #सूर्यतेज #स्वाध्याय #नामजप #हरहरगीता #हरघरगीता #gitainhindi #dailyshlok #Krishna
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आज के 5 श्लोक:
द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ—क्योंकि सारी कर्म-धारा ज्ञान में समाप्त होती है (4.33)
देहान्तरण का धीर बोध—जैसे शरीर में कौमार्य, यौवन, जरा बदलते हैं, वैसे ही आत्मा नया शरीर लेती है (2.13)
पुरुष और गुणों सहित प्रकृति को तत्त्वतः जानने वाला फिर नहीं जन्मता (13.23)
सम्पूर्ण कर्म भगवान में अर्पित कर, अनन्य भक्तियोग से भजना (12.6)
अधर्म से कुलस्त्रियाँ दूषित होती हैं, वर्णसङ्कर उत्पन्न होता है (1.41)
CTA:
कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (4.33/2.13/13.23/12.6/1.41)"
और "आज मैं किस जगह ‘ज्ञानयज्ञ + देहान्तरण का बोध + कर्म-समर्पण’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"
श्रीहरीनी श्रीरामाचा अवतार का घेतला?
सनकानंद आणि भ्रुगि मुनींचा श्रीविष्णूंचा शाप
राधा रानी जी की सुबह की आरती और दर्शन अत्यंत पवित्र और मन को शांति देने वाले होते हैं। प्रातःकाल मंदिर के कपाट खुलते ही भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। शंख, घंटा और भजनों की मधुर ध्वनि से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। राधारानी जी को सुंदर वस्त्र, फूलों और आभूषणों से सजाया जाता है। दीपों की उज्ज्वल ज्योति में उनका दिव्य स्वरूप और भी मनमोहक दिखाई देता है। भक्त श्रद्धा और प्रेम से आरती में भाग लेकर उनके चरणों में शीश झुकाते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥उच्चारण की विधि - श्रेयान्, द्रव्यमयात्, यज्ञात्, ज्ञानयज्ञः, परन्तप, सर्वम्, कर्म, अखिलम्, पार्थ, ज्ञाने, परिसमाप्यते ॥ ३३॥शब्दार्थ - परन्तप पार्थ अर्थात् हे परंतप अर्जुन !, द्रव्यमयात् अर्थात् द्रव्यमय, यज्ञात् अर्थात् यज्ञकी अपेक्षा, ज्ञानयज्ञः अर्थात् ज्ञानयज्ञ, श्रेयान् अर्थात् अत्यन्त श्रेष्ठ है (तथा), अखिलम् अर्थात् यावन्मात्र, सर्वम् अर्थात् सम्पूर्ण, कर्म अर्थात् कर्म, ज्ञाने अर्थात् ज्ञानमें, परिसमाप्यते अर्थात् समाप्त हो जाते हैं।हे परंतप अर्जुन ! द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है, तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञानमें समाप्त हो जाते हैं॥ ३३ ॥4.33देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥उच्चारण की विधि - देहिनः, अस्मिन्, यथा, देहे, कौमारम्, यौवनम्, जरा, तथा, देहान्तरप्राप्तिः, धीरः, तत्र, न, मुह्यति ॥ १३ ॥शब्दार्थ - यथा अर्थात् जैसे, देहिनः अर्थात् जीवात्माकी, अस्मिन् अर्थात् इस, देहे अर्थात् देहमें, कौमारम् अर्थात् बालकपन, यौवनम् अर्थात् जवानी (और), जरा अर्थात् वृद्धावस्था (होती है), तथा अर्थात् वैसे ही, देहान्तरप्राप्तिः अर्थात् अन्य शरीरकी प्राप्ति होती है, तत्र अर्थात् उस विषयमें, धीरः अर्थात् धीर पुरुष, न मुह्यति अर्थात् मोहित नहीं होता।जैसे जीवात्माकी इस देहमें बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीरकी प्राप्ति होती है; उस विषयमें धीर पुरुष मोहित नहीं होता ॥ १३ ॥2.13य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥उच्चारण की विधि - यः, एवम्, वेत्ति, पुरुषम्, प्रकृतिम्, च, गुणैः, सह, सर्वथा, वर्तमानः, अपि, न, सः, भूयः, अभिजायते ॥ २३ ॥शब्दार्थ - एवम् अर्थात् इस प्रकार, पुरुषम् अर्थात् पुरुषको, च अर्थात् और, गुणैः अर्थात् गुणोंके, सह अर्थात् सहित, प्रकृतिम् अर्थात् प्रकृतिको, यः अर्थात् जो मनुष्य, वेत्ति अर्थात् तत्त्वसे जानता है *, सः अर्थात् वह, सर्वथा अर्थात् सब प्रकारसे, वर्तमानः अर्थात् कर्तव्य कर्म करता हुआ, अपि अर्थात् भी, भूयः फिर, न अर्थात् नहीं, अभिजायते अर्थात् जन्मता ।इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य तत्त्वसे जानता है*, वह सब प्रकारसे कर्तव्यकर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता ॥ २३॥13.23ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ६ ॥उच्चारण की विधि - ये, तु, सर्वाणि, कर्माणि, मयि, सन्न्यस्य, मत्पराः, अनन्येन, एव, योगेन, माम्, ध्यायन्तः, उपासते ॥ ६॥शब्दार्थ - तु अर्थात् परंतु, ये अर्थात् जो, मत्पराः अर्थात् मेरे परायण रहनेवाले भक्तजन, सर्वाणि अर्थात् सम्पूर्ण, कर्माणि अर्थात् कर्मोंको, मयि अर्थात् मुझमें, सन्न्यस्य अर्थात् अर्पण करके, माम् अर्थात् मुझ सगुणरूप परमेश्वरको, एव अर्थात् ही, अनन्येन अर्थात् अनन्य, योगेन अर्थात् भक्तियोगसे, ध्यायन्तः अर्थात् निरन्तर चिन्तन करते हुए, उपासते अर्थात् भजते हैं * ।परन्तु जो मेरे परायण रहनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वरको ही अनन्य भक्तियोगसे निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं * ॥ ६ ॥12.06अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । स्त्रीषु दुष्टासु वाष्र्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥उच्चारण की विधि - अधर्माभिभवात्, कृष्ण, प्रदुष्यन्ति, कुलस्त्रियः, स्त्रीषु, दुष्टासु, वाष्र्णेय, जायते, वर्णसङ्करः ॥ ४१॥शब्दार्थ - कृष्ण अर्थात् हे कृष्ण !, अधर्माभिभवात् अर्थात् पापके अधिक बढ़ जानेसे, कुलस्त्रियः अर्थात् कुलकी स्त्रियाँ, प्रदुष्यन्ति अर्थात् अत्यन्त दूषित हो जाती हैं (और), वाष्र्णेय हे वाष्र्णेय!, स्त्रीषु अर्थात् स्त्रियोंके, दुष्टासु अर्थात् दूषित हो जानेपर, वर्णसङ्करः अर्थात् वर्णसंकर, जायते अर्थात् उत्पन्न होता है।हे कृष्ण! पापके अधिक बढ़ जानेसे कुलकी स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वाष्र्णेय ! स्त्रियोंके दूषित हो जानेपर वर्णसंकर उत्पन्न होता है ॥ ४१ ॥1.41
🚨_99__लोगों_को_नहीं_पता!_तीनों_लोकों_का_असली_विज्ञान_🕉️___Premanand_Ji_Ke_Pravachan
भगवान_ने_खुद_मशाल_लेकर_रात_के_अंधेरे_में_दिखाया_रास्ता_—_अनसुनी_कथा!_Shri_Hit_Premanand_Maharaj(720p
भगवान_ने_खुद_मशाल_लेकर_रात_के_अंधेरे_में_दिखाया_रास्ता_—_अनसुनी_कथा!_Shri_Hit_Premanand_Maharaj(
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जीवन_में_जब_भी_दुःख_आये_ये_सत्संग_सुन_लेना_!____Shri_Hit_Premanand_Ji_Maharaj
SRI JAGANNATH MANDIR🕉ROHINI DELHI🤩03-04-2026✅️
Day 63: विराट रूप, सात्त्विकी धृति और मोह से मुक्ति | हर हर गीता, हर घर गीता! Bhagavad Gita Daily Sh
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आज के Day 63 में 5 अत्यंत गहरे श्लोक हैं—भगवान के विराट रूप का अद्भुत दर्शन, मन-प्राण-इन्द्रियों को संभालने वाली सात्त्विकी धृति, आशारहित कर्म की शुद्धता, भगवान का सबके हृदय में स्थित आत्मा रूप, और ऐसा ज्ञान जो मोह को हमेशा के लिए मिटा देता है। गीता के 11.10 में अर्जुन भगवान के विश्वरूप में अनेक मुख, नेत्र, दिव्य आभूषण और दिव्य आयुधों से युक्त अलौकिक दर्शन देखते हैं।
यह video उन लोगों के लिए है जो गीता को केवल पढ़ना नहीं, जीना चाहते हैं—धृति कैसे सात्त्विकी बने, कर्म कैसे पापरहित बने, और ऐसा ज्ञान कैसे जागे जिससे सब भूत अपने भीतर और परमात्मा में दिखने लगें। 18.33 सात्त्विकी धृति को अव्यभिचारिणी योगयुक्त धारणशक्ति बताता है, और 4.35 कहता है कि इस ज्ञान को जानकर साधक फिर मोह में नहीं पड़ता।
इस वीडियो में आपको मिलेगा:
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आपके दिए हुए 5 श्लोक, उसी क्रम और format में
प्रत्येक श्लोक के बाद interactive reflection
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मेरा श्लोक = 11.10 / 18.33 / 4.21 / 10.20 / 4.35
आज का अभ्यास =
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kiya Aklyabe ko guru dronacharya ne dhokha diya tha
video editor abhay Gupta
अपना_दुःख_किसी_को_मत_बताना_!____02-04-26____Shri_Hit_Premanand_Ji_Maharaj