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ध्यान का असली अर्थ: कुछ पाने से पहले... बहुत कुछ खोने की यात्रा 🧘‍♂️✨

3 Views· 26/03/26
ध्यान समाधि
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ध्यान का असली अर्थ: कुछ पाने से पहले... बहुत कुछ खोने की यात्रा 🧘‍♂️✨
​लोग अक्सर पूछते हैं कि ध्यान से क्या मिलता है? पर क्या आपने कभी सोचा है कि ध्यान हमसे क्या छीन लेता है?
​अक्सर जब हम 'ध्यान' या 'मेडिटेशन' शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में एक ही विचार आता है— 'शांति'। हमें लगता है कि ध्यान करने से हमें कुछ प्राप्त होगा, कोई शक्ति मिलेगी या कोई चमत्कार होगा। लेकिन 'ध्यान से समाधि' की इस यात्रा में, सत्य इससे कहीं अधिक गहरा और सुंदर है।
​अध्यात्म की भाषा में, ध्यान कुछ 'पाने' की प्रक्रिया नहीं, बल्कि बहुत कुछ 'खोने' का उत्सव है।
​1. अहंकार और पुरानी धारणाओं का विसर्जन
​हमारा मन आज एक भारी गट्ठर की तरह है, जिसमें सालों पुरानी यादें, डर, शिकायतें और वो तमाम धारणाएं भरी हुई हैं जो समाज ने हम पर थोपी हैं। ध्यान उस ऊँचे पहाड़ की तरह है जहाँ खड़े होकर आप इस भारी बोझ को नीचे गिरा देते हैं। जब तक हाथ खाली नहीं होंगे, तब तक परमात्मा का प्रेम उनमें कैसे भरेगा?
​इसलिए, ध्यान की पहली शर्त है—'मैं' का मिटना। जब आपका 'अहंकार' धुएं की तरह उड़ जाता है, तभी आप हल्का महसूस करते हैं।
​2. अपनी झूठी पहचान को खोना
​दुनिया हमें हमारे नाम, पद, प्रतिष्ठा और रिश्तों से जानती है। मैं एक अधिकारी हूँ, मैं एक पिता हूँ, मैं अमीर हूँ—ये सब बाहरी परतें हैं। ध्यान की गहराई में उतरते ही ये सारी पहचान पिघलने लगती हैं।
​वहाँ आप न किसी के पुत्र रहते हैं, न मित्र। आप केवल एक 'साक्षी' बन जाते हैं—एक शुद्ध चेतना, एक तुच्छ सेवक जो अपने आराध्य के चरणों में समर्पित है। अपनी इस झूठी पहचान को खोना ही वास्तविक स्वतंत्रता है।
​3. डर और विकारों की आहुति
​काम, क्रोध, लोभ और मोह—ये वो ज़ंजीरें हैं जो हमें अशांत रखती हैं। निर्देशित ध्यान (Guided Meditation) हमें सिखाता है कि कैसे इन विकारों को ध्यान की अग्नि में समर्पित कर दिया जाए। जब आप अपने डर को खो देते हैं, तो आप 'अभय' हो जाते हैं।
​पूज्य प्रेमानंद महाराज जी अक्सर कहते हैं कि जब 'मैं' पूरी तरह मिट जाता है, तभी 'वह' (परमात्मा) प्रकट होता है। जहाँ अहंकार शून्य है, वहीं भक्ति अनंत है।
​4. शून्यता से पूर्णता की ओर
​जब आप सब कुछ खो देते हैं—अपनी चिंताएं, अपनी पहचान और अपनी चाहतें—तब आप 'शून्य' हो जाते हैं। और मज़े की बात यह है कि इसी शून्यता में आपको 'पूर्णता' का बोध होता है। आप महसूस करते हैं कि आप कभी अकेले थे ही नहीं; आप तो उस अनंत परमात्मा का ही एक अंश हैं।
​निष्कर्ष
​तो अगली बार जब आप ध्यान में बैठें, तो यह मत सोचिए कि आज क्या मिलेगा। बस यह देखिए कि आज आप और क्या छोड़ सकते हैं। अपनी सांसों को 'श्री हरिवंश' के नाम के साथ जोड़ें और खुद को पूरी तरह समर्पित कर दें।
​याद रखें, स्वयं की खोज ही परमात्मा का बोध है।
​जय श्री राधे! श्री हरिवंश!
यदि आप इस आध्यात्मिक यात्रा का अनुभव करना चाहते हैं, तो हमारे 'निर्देशित ध्यान' के वीडियो को ज़रूर देखें। 🚩
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 1 Comments sort   Sort By


Nilesh
Nilesh 1 month ago

mene apke channel ko like , comment and subscribe kiya h aap bhi mere channel ko like , comment and subscribe kr lijiye ga
hme ase hi ek dusre ko support krna chahiye thank you

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