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फणीश्व.रनाथ रेणु ने अपनी चर्चित कहानी लाल पान की बेगम से स्त्री सशक्तिकरण की मिसाल पेश की थी। इस कहानी से उन्होंने बताया था कि स्त्रियों भी अपनी जिंदगी को अपनी शर्तो पर जीना चाहती है। वह आत्मसम्मान चाहती है पर्दे की प्रथा हो या ऐसी कोई भी कुप्रथा जो उन्हें गुलामों सा जीवन जीने पर मजबूर करती हो वह अब उन्हें स्वीकार्य नहीं है।
उनकी इस कहानी पर आधारित नाटक लाल पान की बेगम का मंचन रविवार की शाम कालिदास रंगालय में किया गया।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" (7 मार्च, 1911 - 4 अप्रैल, 1987) को कवि, शैलीकार, कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देने वाले कथाकार, ललित-निबन्धकार, सम्पादक और अध्यापक के रूप में जाना जाता है।[1] इनका जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के कसया, पुरातत्व-खुदाई शिविर में हुआ।[2] बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिहारऔर मद्रास में बीता। बी.एससी. करके अंग्रेजी में एम.ए. करते समय क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़कर बम बनाते हुए पकड़े गये और वहाँ से फरार भी हो गए। सन्1930 ई. के अन्त में पकड़ लिये गये। अज्ञेय प्रयोगवाद एवं नई कविताको साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने वाले कवि हैं। अनेकजापानी हाइकु कविताओं को अज्ञेय ने अनूदित किया। बहुआयामी व्यक्तित्व के एकान्तमुखी प्रखर कवि होने के साथ-साथ वे एक अच्छे फोटोग्राफर और सत्यान्वेषी पर्यटक भी थे।
हिंदी कहानी के इतिहास में उसने कहा था के बाद शेखर जोशी विरचित कोसी का घटवार अपनी तरह की अलग और विशेष प्रेमकहानी है।
फौजी जवान गुंसाई और लछमा की कहानी, जहां सांसारिक अर्थ में प्रेम परास्त होता है। बड़े-बूढ़ों की जिद लछमा का विवाह कहीं और करवा देती है, क्योंकि गुंसाई अनाथ है और फौज में उसकी जान का भी भरोसा नहीं।1कहानी बताती है कि लछमा का पति रामसिंह भी फौज में है पर उसके पीछे भरापूरा परिवार है।
यह मनोविज्ञान कि अकेले आदमी को ब्याह कर बेटी संकट में पड़ सकती है और उधर दूसरे आदमी पर संकट आया भी तो परिवार देखभाल के लिए है, खोखला निकलता है। रामसिंह नहीं रहता और क्योंकि मनोविज्ञान जटिल विषयवस्तु है, रामसिंह के जेठ-जिठानी वाले परिवार का भी एक मनोविज्ञान है, जो विधवा लछमा और बच्चे को खुद पर बोझ और ज़मीन-जायदाद पर अवांछित अधिकारी मानता है।
अमृतसर आ गया है", भीष्म साहनी द्वारा लिखित एक कहानी है।यह किताब भारत के विभाजन के परिदृश्य पर लिखी गई है। कहानी में शरणार्थियों के एक समूह का पाकिस्तान से भारत के सीमावर्ती शहर अमृतसर की ओर यात्रा के दौरान के भयावहता और विनाश का वर्णन हैं।साहनी ने विभाजन के विषय पर अपना महाकाव्य उपन्यासतमस (1973) भी लिखा था, जिस पर गोविंद निहलानी ने एक टीवी फिल्म बनाया था।
चीफ की दावत ’ भीष्म साहनी द्वारा रचित प्रमुख कहानी है। इस कहानी में उन्होने मध्यमवर्गीय समाज के खोखलेपन तथा दिखावटीपन को दर्शाया है। उनके द्वारा रचित कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। जितनी उस समय थी। भीष्म साहनी ने शामनाथ के माध्यम से शिक्षित युवा पीढ़ी पर करारा व्यंग्य किया है। आज के शिक्षित युवा वर्ग अपने माता पिता को बोझ समझते हैं। व्यक्ति अपनी सुख सुविधा के लिए अपने माता पिता को छोड़ देते हैं। वे यह तक भूल जाते हैं कि आज जिस समाज मे तुम रह रहे हो उनकी बदौलत है। अपने बच्चो को काबिल बनाने के लिए माता पिता अपना सर्वस्व समर्पित कर देते हैं। उनका पूरा जीवन अपने बच्चों की खुशी के लिए बलिदान में व्यतीत हो जाता है। ‘ चीफ की दावत ’ एक ऐसी ही कहानी है , जिसमें स्वार्थी बेटे शामनाथ को अपनी विधवा बूढ़ी माँ का बलिदान फर्ज ही नजर आता है।
भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर कृष्णा सोबती अपने संयमित अभिव्यक्ति और सुथरी रचनात्मकता के लिए मशहूर हैं। कविता में गद्य के क्षेत्र में पदार्पण करने वाली हिंदी की प्रख्यात कथाकार कृष्णा सोबती का लेखन आज भी काव्य की कोमलता एवं माधुर्य से ओतप्रोत है। हिंदी कथा साहित्य को नए रचनात्मक आयाम देती भाषा शैली उनके पास है। नारी के अंतर्मन को पहचानने की कला में निपुण हैं। उनकी कहानियाँ कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टियों से उनके रचनात्मक वैविध्य को रेखांकित करती हैं। आज के बदलते परिवेश में भी इनकी कहानियों की प्रासंगिकता बनी हुई है।
इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर - हरिशंकर परसाई #कहानी Inspecter mata din Chad per - Hari Shanker Parasai
हरिशंकर परसाई (२२ अगस्त, १९२४ - १० अगस्त, १९९५) हिंदी के प्रसिद्ध लेखक और व्यंगकार थे। उनका जन्म जमानी, होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था। वे हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के–फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा। उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी ही पैदा नहीं करतीं बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने–सामने खड़ा करती है, जिनसे किसी भी व्यक्ति का अलग रह पाना लगभग असंभव है। लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है। सामाजिक पाखंड और रूढ़िवादी जीवन–मूल्यों के अलावा जीवन पर्यन्त विस्ल्लीयो पर भी अपनी अलग कोटिवार पहचान है। उड़ाते हुए उन्होंने सदैव विवेक और विज्ञान–सम्मत दृष्टि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा–शैली में खास किस्म का अपनापा है, जिससे पाठक यह महसूस करता है कि लेखक उसके सामने ही बैठा है।ठिठुरता हुआ गणतंत्र की रचना हरिशंकर परसाई ने किया जो एक व्यंग है
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