Geeta ji
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गीता का पाँचवाँ श्लोक
दुर्योधन के कथन के माध्यम से
एक गहरा सत्य प्रकट करता है —
जहाँ धर्म होता है,
वहाँ शक्ति स्वतः प्रकट होती है।
पांडवों की ओर से
भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य जैसे नहीं,
बल्कि ऐसे वीर योद्धा खड़े हैं
जो धर्म के लिए युद्ध कर रहे हैं।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि
जब उद्देश्य शुद्ध होता है,
तो साधन स्वयं सशक्त हो जाते हैं।
जीवन में भी
अगर हम सही मार्ग पर खड़े हों,
तो विरोध के बीच भी
एक अदृश्य बल हमारा साथ देता है।
गीता का यह श्लोक
हमें आश्वस्त करता है कि
धर्म कभी अकेला नहीं होता।
अगर आप जीवन में
सही के साथ खड़े होने का साहस चाहती हैं,
तो यह श्लोक आपके लिए है। 🌿
🙏 धन्यवाद —
गीता को ग्रंथ नहीं,
मार्गदर्शक मानने के लिए।
गीता का चौथा श्लोक
हमें यह दिखाता है कि
जो भीतर से डगमगाता है,
वह बाहर से शक्ति का प्रदर्शन करता है।
दुर्योधन अपने पक्ष के
महावीर योद्धाओं के नाम गिनाता है —
मानो वह दूसरों को नहीं,
खुद को समझा रहा हो कि वह मजबूत है।
यह श्लोक सिखाता है कि
जब आत्मविश्वास भीतर से आता है,
तो उसे शब्दों में साबित करने की ज़रूरत नहीं होती।
जीवन में भी जब हम
बार-बार अपनी उपलब्धियाँ गिनाने लगती हैं,
तो यह संकेत होता है कि
हम भीतर कहीं असुरक्षित हैं।
गीता का यह श्लोक
हमें सिखाता है कि
सच्ची शक्ति शोर नहीं करती,
वह शांत होती है।
अगर आप जीवन में
शक्ति और अहंकार के अंतर को समझना चाहती हैं,
तो यह श्लोक आपके लिए है। 🌸
🙏 धन्यवाद —
शब्दों को सुनने के लिए नहीं,
भाव को समझने के लिए।
गीता का तीसरा श्लोक
हमें यह सिखाता है कि
जहाँ अहंकार होता है, वहाँ भीतर कहीं न कहीं भय छिपा होता है।
दुर्योधन अपनी सेना की विशालता देखकर भी
निश्चिंत नहीं है।
वह गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर
सेना की गिनती करवाता है।
यह श्लोक बताता है कि
जो व्यक्ति स्वयं धर्म पर नहीं खड़ा होता,
वह शक्ति के होते हुए भी
अस्थिर रहता है।
जीवन में भी जब हम
केवल संख्या, पद और बल पर भरोसा करते हैं,
तो भीतर का भय समाप्त नहीं होता।
गीता हमें सिखाती है —
सच्ची शक्ति धर्म से आती है,
और धर्म आत्मविश्वास देता है।
यह श्लोक
अहंकार और असुरक्षा के
सूक्ष्म अंतर को उजागर करता है।
अगर आप जीवन में
डर के कारणों को समझना चाहती हैं,
तो यह श्लोक आपके लिए है। 🌿
🙏 धन्यवाद —
गीता को पढ़ने के लिए नहीं,
स्वयं को पढ़ने के लिए।
श्रीमद्भगवद्गीता का पहला श्लोक केवल एक संवाद नहीं,
जीवन के सबसे गहरे प्रश्न की शुरुआत है।
धृतराष्ट्र का प्रश्न —
“धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे…”
यह प्रश्न आज भी हर मनुष्य के भीतर गूंजता है।
जब जीवन धर्म और अधर्म के बीच खड़ा होता है,
तब मन पूछता है — अब क्या होगा?
गीता का पहला श्लोक हमें सिखाता है कि
जहाँ धर्म होता है,
वहाँ प्रश्न होते हैं,
संघर्ष होता है,
और वहीं से ज्ञान का जन्म होता है।
यह चैनल गीता को केवल श्लोक के रूप में नहीं,
बल्कि जीवन के मार्गदर्शन के रूप में प्रस्तुत करता है।
अगर आप शांति, समझ और आत्मबोध की तलाश में हैं,
तो यह यात्रा आपके लिए है। 🌸
🙏 सुनने के लिए नहीं,
जीने के लिए।