מִכְנָסַיִים קְצָרִים

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“मेहरानगढ़ हवेली की लौटती आहटें”
राजस्थान की सीमा पर स्थित सदियों पुरानी मेहरानगढ़ हवेली आज भी अपने भीतर एक ऐसा राज छुपाए बैठी है, जिसका आतंक समय के साथ और गहरा होता जा रहा है। महारानी चारुलता, जो 120 साल पहले रहस्यमय तरीके से गायब हो गई थीं, कहा जाता है कि अब भी हवेली में लौटने वाले कदमों की तरह भटकती हैं।

जब शहर से आए तीन साहसी लोग—आकाश, विधि और सौरभ—हवेली के अंदर कदम रखते हैं, तो वे एक ऐसे भयावह रहस्य में फंस जाते हैं जिसे समझना इंसानी बस की बात नहीं। खाली सीढ़ियों पर गूंजते ऊँची एड़ी की आवाज़ें, बिना बिजली के जल उठता झूमर, और सीढ़ियों पर धीरे-धीरे उतरती एक अदृश्य महिला की परछाईं…

क्या महारानी चारुलता वास्तव में वापस आ चुकी हैं?
और अगर हाँ—तो तीनों पर्यटक अब कहाँ हैं?

अगली सुबह हवेली शांत थी, पर सीढ़ियों पर तीन नए कदमों के निशान थे…
मानो कोई अभी-अभी हवेली में दाख़िल हुआ हो—और वापस कभी न लौटा हो।

एक सिहरन भरी कहानी, जहाँ हर कदम पर मौत नहीं… बल्कि किसी की वापसी छिपी है।

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बिहार के एक सुनसान गाँव में खड़ा है एक पुराना आम का पेड़, जिसे लोग “कुहासा वाला पेड़” कहते हैं। रात होते ही उसके चारों तरफ़ रहस्यमयी धुंध फैल जाती है—और उसी धुंध में छिपी है एक जली-बुझी आत्मा, जो अपने खोए हुए बच्चे की तलाश में भटकती है। पूजा नाम की लड़की एक रात जब shortcut लेते हुए उस पेड़ के पास पहुँचती है, तो उसे एक ऐसी परछाईं दिखती है जो उसके जीवन का आख़िरी सच बन जाती है। पेड़ के नीचे रोती हुई वह औरत… उसका विकृत चेहरा… और पूजा के बैग में हिलती वह चीज़—सब एक ऐसे रहस्य को उजागर करते हैं, जिसे गाँव वाले आज भी दबाकर रखना चाहते हैं। कहते हैं, जिसने भी उस पेड़ के पास टंगे हिलते बैग को देखा… वह कभी वापस नहीं आया।

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⁣एक छोटे, शांत और साधारण से दिखने वाले किराए के कमरे में रहने आया रवि, पहले ही दिन अजीब चीज़ महसूस करता है—बिस्तर के पास वाली दीवार से आती बेहद धीमी साँसों की आवाज़। शुरुआत में वह इसे अपने वहम या दूसरी तरफ़ के खाली स्टोररूम का असर समझता है, लेकिन रात गहराते ही कमरे का सन्नाटा किसी डरावने सच को जन्म देता है।

हर रात दीवार मानो ज़िंदा होने लगती है—
धीमी, गर्म साँसें…
अंदर से आती खुरचने की आवाज़…
और फिर… दीवार की सतह से उभरी हुई दो उंगलियाँ, जो बाहर आने की कोशिश कर रही हैं।

जैसे किसी को दीवारों के बीच ज़िंदा दफन कर दिया गया हो…
और वह अब भी मदद के लिए चीख रहा हो।

रवि को समझ आता है कि उसके नए कमरे की दीवार में कोई सिर्फ़ फँसा नहीं है…
बल्कि जाग चुका है।

यह कहानी एक क्लौस्ट्रोफोबिक, मनोवैज्ञानिक और अलौकिक हॉरर का अनुभव कराती है, जहाँ कमरे की चारदीवारी ही डर का असली चेहरा बन जाती है।

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