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गीता का छठा श्लोक
हमें यह सिखाता है कि
दृष्टिकोण जीवन की वास्तविकता को आकार देता है।
दुर्योधन अपने सलाहकारों से पूछता है
कि पांडव किस स्थिति में हैं,
क्योंकि वह केवल अपने ही नजरिए से देखता है।
उसकी आँखें तथ्यों से नहीं,
भावना और भय से प्रभावित हैं।
यह श्लोक बताता है कि
जब हम परिस्थितियों को केवल डर या अहंकार से देखते हैं,
तो हमारी समझ अधूरी रहती है।
सच्चा ज्ञान तब आता है,
जब हम निष्पक्ष दृष्टि अपनाते हैं।
जीवन में भी यही सत्य है —
सिर्फ़ वही व्यक्ति सही निर्णय ले सकता है
जो भावनाओं में फंसे बिना,
सच्चाई को देख सके।
गीता का यह श्लोक
हमें सतर्क दृष्टि और विवेक का महत्व सिखाता है।
🙏 धन्यवाद —
सिर्फ़ देखने के लिए नहीं,
समझने के लिए।
Kohinoor दुनिया के सबसे प्रसिद्ध और विवादित हीरों में से एक है। इसका नाम फ़ारसी भाषा से लिया गया है, जिसका मतलब है “रोशनी का पर्वत” (Mountain of Light)। यह हीरा भारत से मिला था और इसका इतिहास लगभग 5000 साल पुराना माना जाता है।
कहां मिला था?
Kohinoor सबसे पहले आंध्र प्रदेश के गोलकुंडा खदानों से निकला था। यह हीरा मुग़लों, फ़ारसियों, अफ़ग़ानों और सिखों के हाथों में रहा।
इतिहास में इसका सफर
इसे मुगल बादशाह बाबर ने भी अपनी किताब में जिक्र किया है।
नादिर शाह ने भारत पर आक्रमण करके इसे अपने साथ फारस ले गया और वहीं इसका नाम “Koh-i-Noor” पड़ा।
महाराजा रणजीत सिंह के पास यह हीरा लंबे समय तक रहा।
बाद में अंग्रेजों ने इसे पंजाब से अपने कब्जे में लेकर ब्रिटेन भेज दिया।
अभी Kohinoor कहां है?
यह हीरा अब ब्रिटेन के Royal Collection में है और पारंपरिक रूप से Queen Consort के मुकुट में लगाया जाता है।
क्यों है विवादित?
भारत, पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान सभी इस हीरे पर अपना दावा करते हैं। भारत इसे अपनी ऐतिहासिक धरोहर मानता है और वापस मांगता है।
विशेषताएं
वजन: लगभग 105 कैरेट (पहले इससे भी बड़ा था, बाद में तराशा गया)
रंग: साफ, पारदर्शी
मूल्य: अमूल्य—इसकी कीमत का अनुमान लगाना भी मुश्किल है।
समुद्र मंथन की पौराणिक कथा में देवताओं और असुरों ने मिलकर अमरता का अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र का मंथन किया। मंथन से कई अद्भुत रत्न निकले, जिनमें सबसे मूल्यवान था — अमृत। जब अमृत कलश निकला, तो असुरों ने उसे छीनने की कोशिश की, ताकि वे अमर हो सकें और देवताओं पर विजय प्राप्त कर सकें। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर असुरों को मोहित किया और अमृत देवताओं को पिला दिया। एक असुर, राहु, ने धोखे से अमृत पी लिया, लेकिन सूर्य और चंद्रमा ने उसकी पहचान कर ली। विष्णु ने तुरंत उसका सिर काट दिया। राहु का सिर अमर हो गया और यही कारण है कि राहु और केतु ग्रहण का कारण माने जाते हैं। यह कथा अमरता की लालसा, छल-कपट और ईश्वरीय न्याय का प्रतीक मानी जाती है।



