Apnatube
|Mga subscriber
Tungkol sa
क्या आपको भी कभी यह संदेह ,संशय या ख्याल आया कि <br> *बुद्धत्व प्राप्त ओशो* जैसे *सदगुरु* Enlightened Mastereके वक्तव्य इतने *विरोधाभाषी* और *अंतर्विरोध* से क्यों भरे हैं !? <br> <br> *ओशो* के विरोधियों , पारंपरिक धर्म मानने वालों को तो मौका मिल जाता है, उनको असत्यवादी , confused, और स्वयं खंडन मंडन करने वाला उलझा हुआ विचारक कहने का ? <br> <br>क्या *ओशो* जैसे *तर्कशील दार्शनिक रहस्यवादी सदगुरु* जानबूझकर या अनजाने ऐसी गलतियां कर गए !? <br> <br>नहीं, *किसी के समझने में भूल होगी* । *ओशो* ने स्वयं कहा था कि <br> *"मैं अपने वक्तव्यों के लिए तो जिम्मेवार हूं लेकिन तुम्हारी समझ का नहीं" !* <br> जब तक आप " *सम्यक श्रवण* " *(Right Listening* ) नहीं जानते ,जब तक *श्रावक* " नहीं बनते, तब तक सिर्फ *"श्रोता" बनकर उन्हें नहीं समझ सकते ,,!* <br> *श्रावक होना* किसी *बुद्धत्व प्राप्त व्यक्ति को समझना एक न्यूनतम पात्रता है , योग्यता है।* <br> <br>इसलिए इसका उत्तर स्वयं देने , सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है ! <br>क्योंकि *ओशो ने स्वयं इसका उत्तर दे दिया है* । <br> <br> *सवाल जिससे हो वही जवाद दे तभी जवाब पूर्ण होता है।* दूसरे जो जवाब देंगे वे *अधूरे ,अनुमान* होंगे ! <br> *ओशो* ने अपने जीवन काल में *साधना के प्रथम चरण में* - <br> *तमो गुण* फिर *रजो गुण * फिर **सतो गुण* प्रधान *साधना* की । और *उन तीनों अंग अलग कालखंडों में उस दौरान जो वक्तव्य, प्रवचन दिए वे आपस में विरोधाभाषी हो गए।* <br> <br>*ओशो ने उत्तर जो उन्होंने साधनाकाल में अनुभव और प्रयोग करके दिया था*। <br>कृपया *श्रावक बनकर सम्यक श्रवण करें* ।🙏 <br> . तो देखिए, पढ़िए, सुनिए...👉🏻 <br>🥀🌷🌹🌺🌼🌸💮🏵️🪷💐💓🧘👣🙏🪔 <br> <br>कुछ बातें ध्यान में लें, तो समझ में आ सकेगा। एक तो *बुद्ध, महावीर, मोहम्मद और जीसस* जैसे व्यक्तित्व हैं। इन व्यक्तित्वों ने *एक ही गुण को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।* <br> <br> *मोहम्मद और जीसस हैं, रजोगुण उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम है।* <br> <br> *बुद्ध और महावीर हैं, सत्वगुण उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम है।* <br> <br> *लाओत्से और रमण हैं, तमस उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम है।* <br> *कृष्ण तीनों गुणों को एक सा अभिव्यक्ति के लिए प्रयोग कर रहे हैं।* <br>एक और भी संभावना है, *जिसका प्रयोग मैंने किया है।* <br> *तीनों गुणों का एक साथ नहीं, एक—एक गुण का अलग—अलग।* <br> और *मेरी दृष्टि में वही सर्वाधिक वैज्ञानिक है, इसलिए उसका चुनाव किया है।* <br> <br> *तीनों गुण प्रत्येक व्यक्ति में हैं। दो गुणों से कोई भी व्यक्ति बन नहीं सकता।* <br> *एक गुण के साथ किसी व्यक्ति के अस्तित्व की कोई संभावना नहीं है।* <br> उन *तीनों का जोड़ ही आपको शरीर और मन देता है।* <br> जैसे बिना तीन रेखाओं के कोई त्रिकोण न बन सकेगा, वैसे ही *बिना तीन गुणों के कोई व्यक्तित्व न बन सकेगा* । <br> <br> उसमें एक भी गुण कम होगा, तो व्यक्तित्व बिखर जाएगा। <br>अगर कोई व्यक्ति कितना ही सत्व—प्रधान हो, तो सत्व—प्रधान का इतना ही अर्थ है कि सत्व प्रमुख है, बाकी दो गुण सत्व के नीचे छिप गए हैं, दब गए हैं। लेकिन वे दो गुण मौजूद हैं। और उनकी छाया सत्वगुण पर पड़ती रहेगी। प्रधानता उनकी नहीं है, वे गौण हैं। आपमें कोई भी गुण प्रकट हो, तब दो मौजूद होते हैं। <br> <br> *कृष्ण ने तीनों गुणों का एक साथ प्रयोग किया है* । जैसे तीनों गुणों की तीनों भुजाएं समान लंबाई की हैं; त्रिभुज की तीनों रेखाएं समान लंबाई की हैं। <br>*कृष्ण का व्यक्तित्व तीनों का संयुक्त जोड़ है। और इसलिए कृष्ण को समझना उलझन की बात है।* <br>एक गुण वाले व्यक्ति को समझना बहुत आसान है। <br> <br> *जिसमें दो गुण दबे हों, उसके व्यक्तित्व में एक संगति होगी, Consistency होगी।* <br>*लाओत्से* के व्यक्तित्व में जैसी Consistency, संगति है, वैसी *कृष्ण* के व्यक्तित्व में नहीं है। <br> *लाओत्से का जो स्वाद एक शब्द में है, वही सारे शब्दों में है।* *बुद्ध के वचनों में एक संगति है, गहन संगति है।* <br> बुद्ध ने कहा है, जैसे तुम सागर को कहीं से भी चखो, वह खारा है, वैसे ही तुम मुझे कहीं से भी चखो, मेरा स्वाद एक है। *जीसस या मोहम्मद, इन सबके स्वाद एक हैं।* <br> <br>लेकिन आप *अनेक स्वाद कृष्ण में ले सकते हैं, तीन तो निश्चित ही ले सकते हैं।* <br>और चूंकि तीनों का मिश्रण हैं, इसलिए *_बहुत नए स्वाद भी उस मिश्रण से पैदा हुए हैं।_* <br> <br> इसलिए *कृष्ण का रूप बहुरंगी* है। और *कोई भी व्यक्ति कृष्ण को पूरा प्रेम नहीं कर सकता, उसमें चुनाव करेगा।* <br> जो पसंद होगा, वह बचाएगा; जो नापसंद है, उसे काट देगा। <br>इसलिए अब तक कृष्ण के ऊपर जितनी भी व्याख्याएं हुई हैं, सब चुनाव की व्याख्याएं हैं। <br> <br> न तो *शंकर (शंकराचार्य)* *कृष्ण* को पूरा स्वीकार करते हैं, न *रामानुज* , न *निंबार्क* , न *वल्लभाचार्य* , न *तिलक* , न *गांधी* , न *अरविंद* , *कोई भी कृष्ण को पूरा स्वीकार नहीं करता* । उतने हिस्से कृष्ण में से काट देने पड़ते हैं, जो *असंगत मालूम पड़ते हैं, विरोधाभासी मालूम पड़ते हैं, जो एक—दूसरे का खंडन करते हुए प्रतीत मालूम पड़ते हैं।* <br> <br> *कृष्ण का व्यक्तित्व असंगत होगा ही।* *तीन गुण एक साथ हैं, असंगति पैदा करेंगे।* <br> <br> *"एक और संभावना है, जिसका प्रयोग मैंने किया है"।* *उसमें भी असंगति होगी,* लेकिन *वैसी नहीं जैसी कृष्ण में है।* <br>तीनों गुण व्यक्ति में हैं। और व्यक्तित्व की पूर्णता तभी होगी, जब तीनों गुण अभिव्यक्ति में उपयोग में ले लिए जाएं, उनमें से कोई भी दबाया न जाए। <br> <br> *कृष्ण भी दमन के पक्ष में नहीं हैं, मैं भी दमन के पक्ष में नहीं हूं।* और जो भी व्यक्तित्व में है, उसका सृजनात्मक उपयोग हो जाना चाहिए। <br> <br> *मेरी प्रक्रिया तीनों गुणों को एक साथ अभिव्यक्ति के लिए न चुनकर तीन अलग—अलग काल—खंडों में एक—एक गुण को अभिव्यक्ति के लिए चुनना है!* <br> <br> *पहले मैंने "तमस " को चुना, क्योंकि वही आधारभूत है, बुनियाद में है।* <br> <br> *"तमस" आधार है और "सत्व" शिखर है।* इस भवन का जिसे हम जीवन कहें, तमस बुनियाद है, *"रजोगुण"* बीच का भवन है और *"सत्वगुण"* मंदिर का शिखर है। <br>यह जीवन की व्यवस्था है मेरी दृष्टि में। <br>इसलिए *मैंने जीवन के पहले खंड को तमस की ही साधना बनाया।* जीवन के *मेरे प्राथमिक वर्ष ठीक "लाओत्से" की रसानुभूति में ही बीते।* इसलिए *लाओत्से से मेरा लगाव बुनियादी है, आधारभूत है।* <br> <br>(इसीलिए *ओशो* ने *ओशो कम्यून* पुणे में अपने आवास का नाम *लाओत्सु* के नाम पर रखा था। ) <br> <br>सब भांति मैं आलस्य में था और आलस्य ही साधना थी। जहां तक बने कुछ न करना। करना मजबूरी हन्ईहो, तो उतना ही करना, जितना अपरिहार्य हो जाए। अकारण हाथ भी न हिलाना, पैर भी न चलाना। <br> <br>ध्यान रहे, *जिस तत्व को भी आप साधना बना लें, थोड़े दिन में उसके पार आप चले ही जाएंगे।* <br> *साधना* का मतलब ही Transcedence है, *अतिक्रमण* है। और *जिसको भी आप पूरी तरह भोग लें, आप उसके भीतर नहीं रह सकते।* <br> अगर आप आलस्य को भी पूरी तरह भोग लें, आप अचानक पाएंगे कि आलस्य विदा हो गया। जिससे मुक्त होना हो, उसे पूरा भोग लेना जरूरी है। <br>इसलिए *मैंने "तमस" को पहले पूरा ही भोग लेना उचित समझा।* <br> <br>उन दिनों बिस्तर पर पडे रहना, ऊपर सीलिंग में देखते रहना, वैकेंट, खाली। बहुत बाद में मुझे पता चला कि *"मेहर बाबा" की साधना वही थी।* *मुझे तो यह अनायास हुआ।* <br> क्योंकि बिस्तर पर पड़े —पड़े करना भी क्या? अगर नींद जा चुकी हो, तो पड़े रहना, सीलिंग को देखते रहना। अगर आप चुपचाप बिना पलक झपाए...... और पलक नहीं झपाना, यह कोई साधना नहीं थी। वह भी जैसे कर्म का हिस्सा है, क्यों झपाना! पड़े रहना। वह भी जैसे आलस्य का हिस्सा है कि पलक भी क्यों झपाना! पड़े रहना। रोकने का कृत्य नहीं था। जहां तक बने कुछ न करना। <br> <br>अगर आप अपने मकान की सीलिंग को ही देखते हुए पड़े रहें घंटे, दो घंटे, आप पाएंगे, चित्त इतना आकाश जैसा कोरा हो जाता है, शून्य हो जाता है। <br>अगर आलस्य को कोई साधना बना ले, तो *शून्य की अनुभूति बड़ी सहज हो जाती है।* <br> <br> *उन दिनों में न मैं ईश्वर को मानता था, न आत्मा को।* न मानने का कारण कुल इतना था कि इन्हें मानने से फिर कुछ करना पड़ेगा। *आलसी के लिए अनीश्वरवाद संगत है।* <br> क्योंकि *अगर ईश्वर है, तो काम शुरू हो गया। फिर कुछ करना पड़ेगा। अगर आत्मा है, तो कुछ करना पड़ेगा।* <br> <br>लेकिन कुछ न करते हुए, *बिना ईश्वर और आत्मा को मानते हुए, उस चुपचाप पड़े रहने में ही उस सब की झलक मिलनी शुरू हो गई, जिसको हम आत्मा कहें, ईश्वर कहें।* <br> <br>और मैने तब तक तमस को नहीं छोड़ा, जब तक तमस ने मुझे नहीं छोड दिया। तब तक मैंने तय किया था कि चलता रहूंगा ऐसा ही, बिना कुछ किए। <br>मेरी अपनी समझ यह है कि *अगर आप तमस को ठीक से जी लें, तो उसके बाद रजोगुण अपने आप पैदा हो जाएगा।* क्योंकि वह दूसरा गुण है, जो आपकी दूसरी मंजिल में छिपा हुआ है। <br> *पहली मंजिल पूरी हो गई; आप सीढ़ियां पार कर आए, रजोगुण शुरू हो जाएगा।* आपमें सक्रियता का उदय होगा। <br> <br>तो *उस सक्रियता को भी मैंने पूरी तरह जी लिया।* बीच में कुछ बाधा डालना मेरी वृत्ति नहीं है। जो भी हो रहा हो, उसे होने देना। और *ऐसे अगर कोई होने दे, तो बहुत जल्दी गुणातीत हो जाएगा।* <br>क्योंकि *तब स्वयं करने वाला नहीं रह जाता, गुण ही करने वाले रह जाते हैं।* <br> वह आलस्य का गुण था, जिसने अपने को पूरा कर लिया। <br> *फिर रजोगुण था।* <br> तो *मैं दौड़ता रहा मुल्क में* । *जितनी यात्रा मैंने दस—पंद्रह साल में की, दों—तीन जीवन में भी एक आदमी नहीं कर सकता !* <br> जितना उन दस—पंद्रह सालों में बोला, उतने के लिए दस—पंद्रह जीवन चाहिए। सुबह से लेकर रात तक चल ही रहा था, बोल ही रहा था, सफर ही कर रहा था। <br> *जरूरत, गैर—जरूरत विवाद और उपद्रव भी खड़े कर रहा था।* <br> क्योंकि *जितने वे विवाद खड़े हो जाएं, उतना मेरे रजोगुण को निकल जाने की सुविधा थी।* <br> तो *गांधी की आलोचना* हाथ में ले ली, या *समाजवाद की आलोचना* हाथ में ले ली। उनसे मेरा कोई संबंध नहीं था। *राजनीति से मेरा कोई भी लगाव नहीं है; रत्तीभर भी मुझे कोई रस नहीं है।* <br>लेकिन जब सारा मुल्क एक विक्षिप्तता में पड़ा हो, सारी मनुष्यता, और अगर आपको भी दौड़ना हो उस मनुष्यता के बीच, तो खेल के लिए ही सही, आपको कुछ उपद्रव अपने आस—पास निर्मित कर लेने चाहिए, कुछ विवाद खड़े कर लेने चाहिए। <br> तो *उस रजोगुण की यात्रा में ढेर विवाद खड़े हुए, और मैंने उनका काफी सुख लिया।* <br> <br>अगर कर्म की विक्षिप्तता से वे पैदा होते, तो उनसे दुख पैदा होता। <br>लेकिन *सिर्फ रजोगुण के निकास की भांति, अभिव्यक्ति की भांति वे थे, तो उन सबमें खेल था और रस था।* <br> *वे विवाद एक अभिनय से ज्यादा नहीं थे।* <br> <br>पंजाब में *पंजाब के एक बड़े वेदांती थे, हरिगिरी जी महाराज। उनसे वेदांत पर एक बड़ा विवाद हुआ।* मेरे लिए एक खेल था, उनके लिए गंभीरता थी। क्योंकि उनके सिद्धात का सवाल था। वे करीब—करीब विक्षिप्त हो जाते थे। <br> <br> *पुरी के शंकराचार्य से पटना में विवाद हो गया। मेरे लिए खेल था,* उनके लिए पूरे व्यवसाय का सवाल था। वे इतने विक्षिप्त हो गए, इतने क्रोध में आ गए कि मंच से गिरते—गिरते बचे। सारा शरीर कंपित हो गया। <br>पर रजोगुण को पूरा निकल जाने देना जरूरी है। <br> बहुत मित्रों ने मुझे रोकना चाहा, पर मैं अपनी तरफ से नहीं रुकना चाहता था। *रजोगुण ही झर जाए, उसकी निर्जरा हो जाए, तो ही रुकूंगा।* <br> <br>आलस्य के दिनों में ( *तमो गुण में* ) मैं बोलता नहीं था, या न के बराबर बोलता था। कोई बहुत पूछे, तो थोड़ा बोलता था। <br> <br> *रजोगुण के दिनों में* कोई न भी पूछे, तो बोलता था। लोगों को ढूंढकर बोलता था; और *बोलने में एक आग थी।* <br> <br> मेरे पास अब भी लोग आते हैं, वे कहते हैं, अब आप वैसा नहीं बोलते कि दिल थर्रा जाता था। एक जोश, अंगार था। <br> *वह अंगार मेरा नहीं था। वह उस गुण का था, जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं।* <br> *वह रजोगुण को जलाने का एक ही उपाय था,* कि वह भभक कर जले। वह पूरा का पूरा अंगारा बन जाए, तो जल्दी राख हो जाएगा। जितने धीरे— धीरे जलेगा, उतना समय लेगा। इकट्ठा जल जाए, *पूर्णता से जले, तो जल्दी राख हो जाएगा।* <br>अब वह जल चुका है। <br> <br>और अब जैसे साझ को सूरज सिकोड़ ले अपनी सारी किरणों को और जैसे सांझ को मछुआ अपने जाल को निकाल ले, *ऐसे मैं सब सिकोड़ लूंगा।* <br> <br> सिकोड़ लूंगा, कहना ठीक नहीं है। *ऐसा सब सिकुड़ जाएगा।* <br> क्योंकि *तीसरा तत्व* शुरू होगा। इसलिए आप देख भी रहे हैं कि *मैं धीरे— धीरे सब हाथ हटाता जा रहा हूं।* <br> <br> आपकी जगह *"पचास हजार" लोग सुन सकते थे,* लेकिन मैं राजी हूं कि *"पचास लोग" सुनें।* <br> *"पचास से पांच पर राजी हो जाऊंगा।"* बोलने से *"न बोलने" पर राजी हो जाऊंगा।* <br>तो जैसे—जैसे *रजोगुण* पूरा फिंक जाता है और *सत्य की प्रक्रिया शुरू होती है,* वैसे—वैसे सभी क्रियाएं फिर *शून्य* हो जाएंगी। <br> <br> *तमोगुण में भी सारी क्रियाएं "शून्य" होती हैं।* लेकिन वह *शून्यता निद्रा जैसी* होती है। <br> <br> *सत्वगुण* में भी *सारी क्रियाएं शून्य* हो जाती हैं। लेकिन वह *शून्यता जागरूकता जैसी* होती है। *तमस* और *सत्य* में एक समानता है कि दोनों शून्य होंगे। *तमस का रूप निद्रा जैसा* होगा; *_सत्य का रूप जागरण जैसा_* होगा। <br> <br>और *इसी को मैं जीवन की ठीक प्रक्रिया मानता हूं कि जीवन का प्रथम चरण तमस में गुजरे, द्वितीय चरण रज में गुजरे, तृतीय चरण सत्व में गुजरे।* <br> और तीनों चरण में *आप अपने को अलग रखने की कोशिश में लगे रहें,* तो आप *साधना* में हैं। और तीनों चरणों में आप जानते रहें कि यह *मैं नहीं कर रहा हूं ये गुण कर रहे हैं।* यह मुझसे नहीं हो रहा है; *मैं सिर्फ देखने वाला हूं मैं सिर्फ साक्षी हूं।* <br> जब आलस्य हो तब भी, जब कर्म हो तब भी, जब सत्य हो तब भी। मैं सिर्फ देखने वाला हूं मैं मात्र द्रष्टा हूं। ऐसी प्रतीति बनी रहे, तो तीनों गुण चुक जाएंगे अपने से और आप *गुणातीत* <br> में ठहर जाएंगे। <br> *कृष्ण ने तीनों को इकट्ठा व्यक्त किया है।* <br> *मैंने तीनों को अलग—अलग एक—एक परिधि में बांटकर उपयोग किया है।* <br> <br> इसलिए *मेरी बातों में भी "असंगति" मिलेगी।* <br> <br> *जो मैंने "तमस के क्षणों "में कहा है और जीया है, वह मेरे "रजस के क्षणों" से उसका कोई मेल नहीं बैठेगा।* और जो मैंने *रजस के क्षणों* में कहा है, वह *मेरे सत्व के क्षणों में कही गई बातों से उसका बहुत विरोध हो जाएगा।* <br> <br>इसलिए जब कोई *मेरे पूरे विचार पर सोचने बैठेगा, तो उसे तीन हिस्सों में तोड़ देना पड़ेगा।* <br> और *तीनों के बीच बड़े विरोध होंगे।* होना ही चाहिए। क्योंकि *तीन अलग गुणों के माध्यम से वे बातें प्रकट हुई हैं।* और *तीनों के बीच संगति असंभव होगी।* <br> <br>अगर मेरे *व्यक्तित्व में संगति* खोजनी हो, तो वह *चौथे में मिलेगी, वह जो गुणातीत है।* <br> इन तीन में संगति नहीं मिल सकेगी। इन तीनों के पीछे जो छिपा *साक्षी— भाव* है, उसमें ही संगति मिल सकती है। <br> <br> *👣ओशो* 🌷🌹💐💓🙏🏻 <br>गीता दर्शन
