Kuldeep.11 Kuldeep bharti
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Kuldeep.11 Kuldeep bharti
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“जेब में नोट थे, पर दिल खाली था…
हँस तो रहे थे, पर अंदर से सब जाली था…”
“दस के नोट जैसी थी वो मुस्कान उसकी,
चलन में थी सबके पास… पर अपनी नहीं थी…”
“पैसों से भरी थी दुनिया मेरी,
पर सुकून उधार भी नहीं मिला…”
“उसने कहा सब ठीक है… और मैं मान गया,
क्योंकि सच सुनने की हिम्मत ही कहाँ थी…”
“नोट गिनते रहे लोग उम्र भर,
मैं यादें गिनता रहा रात भर…”
“बटुआ भारी था, पर दिल हल्का नहीं हुआ,
कुछ दर्द ऐसे थे जो खर्च ही नहीं हुए…”
“वो भी एक दौर था जब हँसी असली थी,
अब तो बस फोटो में फिल्टर वाली खुशी है…”
“दस का नोट मुड़ जाता है जेब में,
वैसे ही मैं भी टूट गया हूँ अंदर से…”

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