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जोधा बाई' नाम का भ्रम
सबसे बड़ा झूठ या ऐतिहासिक गलती यह मानी जाती है कि अकबर की पत्नी का नाम 'जोधा बाई' था।
सच्चाई: अकबर की किसी भी पत्नी का नाम समकालीन दस्तावेजों (जैसे अकबरनामा) में 'जोधा बाई' नहीं मिलता। उनका वास्तविक नाम हीर कुंवारी या हरखा बाई था।
भ्रम का कारण: 19वीं सदी के लेखक कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी किताब 'एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' में पहली बार उन्हें गलती से 'जोधा बाई' कहा था।
2. जोधा बाई का संबंध जोधपुर से था?
झूठ: कई लोग मानते हैं कि वह जोधपुर की राजकुमारी थीं, इसलिए उन्हें जोधा बाई कहा गया।
सच्चाई: हीर कुंवारी (हरखा बाई) आमेर (जयपुर) के राजा भारमल की बेटी थीं। जोधपुर की राजकुमारी जगत गोसाईं थीं, जिनका विवाह अकबर के बेटे सलीम (जहांगीर) से हुआ था। असल में उन्हें ही 'जोधा बाई' कहा जाना चाहिए था क्योंकि वे जोधपुर से थीं।
3. 'मरीयम-उज़-ज़मानी' ईसाई थीं?
झूठ: नाम 'मरीयम' (Mary) होने के कारण कुछ लोग उन्हें ईसाई राजकुमारी मानते हैं।
सच्चाई: यह कोई नाम नहीं, बल्कि एक शाही उपाधि थी जो जहांगीर को जन्म देने के बाद उन्हें दी गई थी। इसका अर्थ होता है 'युग की करुणा' या 'समय की मरियम'। वे जन्म से एक हिंदू राजपूत राजकुमारी थीं।
4. अकबर-जोधा की 'रोमांटिक' प्रेम कहानी
झूठ: फिल्मों और सीरियल्स में इसे एक महान प्रेम कहानी के रूप में दिखाया जाता है।
सच्चाई: अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार, यह मुख्य रूप से एक राजनीतिक गठबंधन (Political Alliance) था। राजा भारमल ने अपने राज्य की सुरक्षा के लिए अकबर के सामने अपनी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव रखा था।
5. क्या अकबर ने धर्म परिवर्तन कराया था?
झूठ: यह भ्रम फैलाया जाता है कि अकबर की पत्नी ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था।
सच्चाई: ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, वह मुग़ल दरबार में भी हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करती थीं। अकबर ने उन्हें अपने महल में पूजा और मंदिर की अनुमति दी थी। उनकी मृत्यु के बाद उन्हें दफनाया जरूर गया था, लेकिन उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उनकी कब्र अकबर के मकबरे के पास बनाई गई थी।
इतिहास के पन्नों में राजपूतों का शौर्य, साहस और बलिदान वास्तव में अतुलनीय रहा है। जब हम "राजपूतों की तरह लड़ने" की बात करते हैं, तो उसका अर्थ केवल युद्ध नहीं, बल्कि एक खास जीवन दर्शन और नैतिक संहिता (Ethos) से होता है।
यहाँ कुछ ऐसे गुण दिए गए हैं जो राजपूत योद्धाओं की पहचान रहे हैं:
1. शरणागत की रक्षा (प्रण पालन)
राजपूतों के लिए 'शरण में आए हुए' की रक्षा करना अपने प्राणों से भी बढ़कर था। "प्राण जाए पर वचन न जाई" उनके जीवन का मूल मंत्र था। चाहे वह हम्मीर देव चौहान का शरणागत के लिए अलाउद्दीन खिलजी से लोहा लेना हो या अन्य उदाहरण, उन्होंने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
2. वीरता और आत्मसम्मान (केसरिया और जौहर)
जब जीत असंभव लगती थी, तब राजपूत योद्धा 'केसरिया' (अंतिम युद्ध के लिए निकलना) करते थे और वीरांगनाएं 'जौहर' करती थीं। यह हार स्वीकार न करने और अपनी गरिमा को सर्वोच्च रखने का एक ऐसा प्रमाण था जिसका उदाहरण विश्व इतिहास में दुर्लभ है।
3. युद्ध कौशल और मर्यादा
राजपूत युद्ध के मैदान में भी नीति और मर्यादा का पालन करते थे। निहत्थे पर वार न करना और पीठ न दिखाना उनकी वीरता का हिस्सा था। महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान और राणा सांगा जैसे योद्धाओं की वीरता की कहानियाँ आज भी प्रेरणा देती हैं।
"सिंहों की दहाड़ और तलवारों की खनक, इतिहास गवाह है कि जब-जब धर्म और देश पर संकट आया, राजपूत ढाल बनकर खड़े हुए।"
