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एक गाँव में मोहन नाम का एक सरल और नेक इंसान रहता था। वह हमेशा दूसरों की मदद करता, भूखों को खाना खिलाता और किसी का बुरा नहीं सोचता। फिर भी उसके जीवन में परेशानियाँ कम नहीं थीं—कभी फसल खराब हो जाती, कभी बीमारी घेर लेती।
एक दिन निराश होकर उसने मंदिर में जाकर भगवान से पूछा, “मैं अच्छा हूँ, फिर मेरे साथ ही बुरा क्यों होता है?”
उसी रात उसे एक सपना आया। उसने देखा कि एक कुम्हार मिट्टी को जोर-जोर से पीट रहा है, चाक पर घुमा रहा है और आग में तपाकर सुंदर घड़ा बना रहा है। मिट्टी दर्द में थी, पर अंत में वह एक मजबूत और उपयोगी घड़ा बन गई।
तभी एक आवाज आई, “मोहन, अच्छे लोगों को इसलिए परखा जाता है ताकि वे और मजबूत, धैर्यवान और उज्ज्वल बन सकें। जैसे कुम्हार मिट्टी को तपाकर उसे सुंदर बनाता है, वैसे ही कठिनाइयाँ इंसान को निखारती हैं।”
सुबह उठकर मोहन की सोच बदल चुकी थी। अब वह हर कठिनाई को एक सीख और अवसर समझने लगा। धीरे-धीरे उसका जीवन भी बेहतर होने लगा।
सीख: अच्छाई का रास्ता आसान नहीं होता, लेकिन अंत में वही सबसे सुंदर फल देता है।
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