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“कुछ जख्म दिखते नहीं, पर रोज़ दर्द देते हैं।”
“अब शिकायत भी खुद से ही है…”
“कुछ जख्म दिखते नहीं, पर रोज़ दर्द देते हैं।”
“अब शिकायत भी खुद से ही है…”
यह कहानी है एक शरारती बंदर और समझदार दादी की, जहाँ मस्ती के साथ छुपा है एक सुंदर संदेश। जंगल के पास रहने वाली दादी और चंचल बंदर के बीच होने वाली मज़ेदार घटनाएँ बच्चों को हँसाएँगी और बड़ों को सोचने पर मजबूर कर देंगी। यह कहानी सिखाती है कि समझदारी, धैर्य और प्रेम से हर समस्या का हल निकाला जा सकता है। बच्चों के लिए रोचक, परिवार के लिए सीख देने वाली यह कहानी अंत तक बाँधे रखेगी।
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