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Corti Creare

"निकलो गलियों में बना कर टोली,
भिगो दो आज हर एक की चोली,
मुस्कुरा कर गले लगो और बोलो...
Happy Holi Dil Se!" 🎈🍭
#holishayari #traditionalholi #indianfestival #holispecial

रंगों की बौछार, अपनों का प्यार, मुबारक हो आपको 'दिल से' होली का त्योहार! 🥳 इस वीडियो में देखिए हमारी होली वाली असली मस्ती।
आपकी होली कैसी रही? कमेंट्स में जरूर बताएं! 👇🎨

Liladhar saini

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जयपुर का विश्व प्रसिद्ध गणगौर पर्व
गणगौर राजस्थान का सबसे महत्वपूर्ण लोक पर्व है, जो चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। 'गण' का अर्थ है भगवान शिव और 'गौर' का अर्थ है माता पार्वती। यह पर्व सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की लंबी आयु के लिए और कुंवारी कन्याओं द्वारा अच्छे वर की कामना हेतु मनाया जाता है।
प्रमुख आकर्षण और परंपराएं
शाही सवारी: जयपुर की गणगौर अपनी भव्य 'शाही सवारी' के लिए दुनिया भर में मशहूर है। सिटी पैलेस (जनानी ड्योढ़ी) से माता गणगौर की प्रतिमा को एक विशाल जुलूस के साथ निकाला जाता है।
लवाजमा (जुलूस): इस सवारी में सजे-धजे हाथी, घोड़े, ऊंट, लोक कलाकार, पारंपरिक बैंड और नृत्य मंडलियाँ शामिल होती हैं। यह नज़ारा ऐसा होता है मानो जयपुर का राजसी इतिहास सड़कों पर उतर आया हो।
घेवर का स्वाद: गणगौर के त्योहार पर जयपुर में 'घेवर' (एक पारंपरिक मिठाई) का विशेष महत्व है। लोग एक-दूसरे को घेवर खिलाकर खुशियां बांटते हैं।
श्रृंगार और लोकगीत: महिलाएं पारंपरिक राजपूती पोशाक (जैसे लहरिया और गोटा-पत्ती की साड़ियाँ) पहनती हैं और हाथों में मेहंदी लगाती हैं। "पूजन द्यो गणगौर..." जैसे मधुर लोकगीतों से पूरा शहर गूंज उठता है।
धार्मिक महत्व
यह त्योहार चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन अपनी चरम सीमा पर होता है। होलिका दहन के अगले दिन से ही महिलाएं मिट्टी की गणगौर बनाकर 16 दिनों तक उनकी पूजा करती हैं। अंतिम दिन, इन प्रतिमाओं को पवित्र सरोवरों या बावड़ियों में विसर्जित किया जाता है।
एक दिलचस्प तथ्य: जयपुर की गणगौर सवारी देखने के लिए न केवल देश से, बल्कि विदेशों से भी हजारों पर्यटक आते हैं। यह दिन 'पिंक सिटी' के असली वैभव को महसूस करने का सबसे अच्छा समय है।

Liladhar saini

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वक्त किसी की अकड़ नहीं छोड़ता समय का चक्र जब घूमता है,तो सबकी अकड़ ढीली कर देता है।

जिन महलों में बैठ कर हुक्मरानों के नाम का सिक्का चलता था। आज वो महल खंडहर बन गए है। दीवारों में पीपल के पेड़ उग आए हैं।

जिन कपड़ो पर अंग्रेजो को अभिमान था
उन्हे आज बैंडबाजे वाले पहनते हैं।
जिन आलीशान हवेलियों के दरवाजों पर

कभी हाथियों और घोड़ों की कतारें लगी
रहती थीं, चौपालों पर महफिलें सजती थी
आज वहां चमगादड़ बसेरा करते हैं।

वक्त न तो किसी की अकड़ छोड़ता है और
न ही किसी का गुरूर। यह एक ऐसा तराजू है
जो हर चमकती चीज को एक दिन मिट्टी में
मिला ही देता है।

इसलिए बड़े-बुजुर्ग कह गए है। कि इंसान को अपनी कामयाबी पर कभी घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि "वक्त बदलते देर नहीं लगती।

Liladhar saini

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